Lawrence Kohlberg
🗓 जन्म: 25 अक्टूबर 1927 | न्यूयॉर्क, USA
💀 निधन: 19 जनवरी 1987
🎓 शिकागो विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में पीएचडी (1958)
🏛 हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर
Lawrence Kohlberg अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने नैतिक विकास (Moral Development) का एक व्यापक सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने जीन पियाजे के नैतिक विकास के काम को और आगे बढ़ाया।
कोह्लबर्ग ने 1958 में अपना शोध शुरू किया और 10 से 16 वर्ष के 72 लड़कों को नैतिक दुविधाओं (Moral Dilemmas) के आधार पर अध्ययन किया।
कोह्लबर्ग के अनुसार नैतिक तर्क (Moral Reasoning) महत्वपूर्ण है — उत्तर सही है या गलत, यह नहीं, बल्कि व्यक्ति क्यों ऐसा सोचता है — यह महत्वपूर्ण है।
कोह्लबर्ग ने अपने अध्ययन में विभिन्न काल्पनिक नैतिक दुविधाएं प्रस्तुत कीं। इनमें सबसे प्रसिद्ध है हेनज की दुविधा:
कहानी: हेनज की पत्नी एक दुर्लभ बीमारी से मर रही है। एक दवाई से वह ठीक हो सकती है। एक दवाई विक्रेता ने उस दवाई को 10 गुना अधिक कीमत पर बेच रहा है। हेनज के पास उतने पैसे नहीं हैं। दुकानदार मना कर देता है। तो क्या हेनज को दवाई चुरानी चाहिए?
कोह्लबर्ग यह नहीं देखते थे कि बच्चे ने हाँ या ना कहा, बल्कि यह देखते थे कि बच्चे ने क्यों ऐसा कहा। इसी तर्क (Reasoning) के आधार पर उन्होंने नैतिक विकास की अवस्थाएं निर्धारित कीं।
| उत्तर | तर्क (Reasoning) → कौनसी अवस्था |
|---|---|
| "नहीं चुरानी चाहिए — पुलिस पकड़ेगी" | अवस्था 1 — दंड से बचना (पूर्व-पारंपरिक) |
| "चुरा लो — पत्नी ठीक हो जाएगी, बाद में दाम चुका देना" | अवस्था 2 — स्वार्थ (पूर्व-पारंपरिक) |
| "चुरा लो — एक अच्छा पति ऐसा ही करेगा" | अवस्था 3 — अच्छा लड़का/लड़की (पारंपरिक) |
| "नहीं चुरानी — कानून है, उसे मानना चाहिए" | अवस्था 4 — कानून और व्यवस्था (पारंपरिक) |
| "चुरा लो — जीवन बचाना सामाजिक अनुबंध से ऊपर है" | अवस्था 5 — सामाजिक अनुबंध (उत्तर-पारंपरिक) |
| "चुरा लो — जीवन का नैतिक मूल्य कानून से बड़ा है" | अवस्था 6 — सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत (उत्तर-पारंपरिक) |
आयु: 4 से 10 वर्ष | बच्चा परिणाम के आधार पर नैतिकता तय करता है।
आज्ञाकारिता और दंड उन्मुखीकरण
Obedience and Punishment Orientation
~4–7 वर्ष
बच्चा दंड से बचने के लिए नियमों का पालन करता है। वह गलत उसे मानता है जिस पर दंड मिलता है।
🎯 उदाहरण: "मैं झूठ नहीं बोलूँगा क्योंकि माँ मुझे डाँटेगी।"
स्वार्थी उद्देश्य अभिमुखी
Instrumental Purpose & Exchange
~7–10 वर्ष
बच्चा अपने स्वार्थ (Personal Interest) के लिए नियमों का पालन करता है। "तू मेरे लिए करेगा, तो मैं तेरे लिए करूँगा।"
🎯 उदाहरण: "अगर तू मुझे खिलाएगा, तो मैं भी तुझे मदद करूँगा।"
आयु: 10 से 13 वर्ष (और अधिकांश वयस्क) | समाज की अपेक्षाओं और कानून के अनुसार चलना।
अच्छा लड़का / अच्छी लड़की
Good Boy – Good Girl Orientation
~10–13 वर्ष
बच्चा दूसरों की नज़रों में अच्छा दिखने के लिए सही कार्य करता है। दूसरों की सहमति और प्रशंसा पाना लक्ष्य है।
🎯 उदाहरण: "मैं मदद करूँगा क्योंकि एक अच्छा बच्चा ऐसा ही करता है।"
कानून और व्यवस्था
Law and Order Orientation
किशोरावस्था+
व्यक्ति कानून और सामाजिक व्यवस्था को सही मानता है और उनका पालन करना अपना कर्तव्य समझता है।
🎯 उदाहरण: "यदि सभी कानून तोड़ने लगें तो समाज टूट जाएगा, इसलिए कानून मानना जरूरी है।"
आयु: वयस्कता (सभी नहीं पहुँचते) | नैतिकता अमूर्त सिद्धांतों पर आधारित।
सामाजिक अनुबंध
Social Contract Orientation
वयस्क
सामाजिक अनुबंध (Social Contract) के अनुसार नियम समाज की भलाई के लिए बनाए जाते हैं। यदि कोई नियम न्यायसंगत नहीं है, तो उसे बदला जा सकता है।
🎯 उदाहरण: "अमेरिकी लोकतंत्र — कानून बहुमत से बनते हैं और बदले जा सकते हैं।"
सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत
Universal Ethical Principles
कुछ ही पहुँचते
व्यक्ति अमूर्त नैतिक सिद्धांतों जैसे न्याय, समानता, मानवीय गरिमा के आधार पर निर्णय लेता है — चाहे कानून कुछ भी कहे।
🎯 उदाहरण: महात्मा गाँधी, मार्टिन लूथर किंग — इन्होंने कानून के विरुद्ध जाकर भी न्याय के लिए लड़े।
स्तर → D-S-U (दंड → समाज → उच्च सिद्धांत)
6 अवस्थाएं → दंड, स्वार्थ, अच्छा बच्चा, कानून, सामाजिक अनुबंध, सार्वभौमिक = "द स अ क सा सा"
| स्तर | अवस्था | नाम | नैतिकता का आधार | आयु |
|---|---|---|---|---|
| पूर्व-पारंपरिक | 1 | दंड उन्मुखीकरण | दंड से बचना | 4–7 वर्ष |
| 2 | स्वार्थी उद्देश्य | स्वार्थ / लेन-देन | 7–10 वर्ष | |
| पारंपरिक | 3 | अच्छा लड़का/लड़की | दूसरों की स्वीकृति | 10–13 वर्ष |
| 4 | कानून और व्यवस्था | कानून का पालन | किशोर+ | |
| उत्तर-पारंपरिक | 5 | सामाजिक अनुबंध | लोकतांत्रिक मूल्य | वयस्क |
| 6 | सार्वभौमिक सिद्धांत | न्याय, गरिमा, समानता | कुछ वयस्क |
1. क्रमबद्धता (Sequential Order)
कोह्लबर्ग के अनुसार नैतिक विकास की अवस्थाएं हमेशा अपरिवर्तनीय क्रम (Invariant Sequence) में होती हैं। कोई भी अवस्था छोड़ी नहीं जा सकती और न ही पीछे जाया जा सकता है।
2. सांस्कृतिक सार्वभौमिकता (Cultural Universality)
कोह्लबर्ग का मानना था कि ये अवस्थाएं सभी संस्कृतियों (Cultures) में एक जैसी होती हैं — चाहे बच्चा अमेरिका में हो, भारत में हो या किसी अन्य देश में।
3. संज्ञानात्मक विकास से संबंध (Link to Cognitive Development)
उच्च नैतिक अवस्थाओं तक पहुँचने के लिए उच्च संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) जरूरी है। बिना पियाजे की औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था के, उत्तर-पारंपरिक स्तर तक नहीं पहुँचा जा सकता।
4. नैतिक तर्क बनाम नैतिक व्यवहार
कोह्लबर्ग नैतिक तर्क (Moral Reasoning) पर ध्यान देते हैं, न कि नैतिक व्यवहार (Moral Behavior) पर। व्यक्ति क्यों सोचता है — यह मायने रखता है।
5. अधिकांश लोग मध्य तक ही पहुँचते हैं
कोह्लबर्ग के अनुसार अधिकांश वयस्क अवस्था 4 (कानून और व्यवस्था) तक ही पहुँच पाते हैं। अवस्था 6 तक बहुत कम लोग पहुँचते हैं।
- कोह्लबर्ग ने अपना अध्ययन किस पर किया → 10–16 वर्ष के 72 लड़कों पर
- कोह्लबर्ग के अनुसार नैतिकता में Reasoning महत्वपूर्ण है, उत्तर नहीं
- कोह्लबर्ग की पुस्तक: "The Philosophy of Moral Development"
- कोह्लबर्ग किसके शिष्य थे → Jean Piaget
- सबसे अधिक प्रसिद्ध दुविधा → हेनज की दुविधा (Heinz Dilemma)
| बिंदु | Jean Piaget | Lawrence Kohlberg |
|---|---|---|
| अवस्थाओं की संख्या | 2 (Pre-moral & Moral) | 6 (3 स्तरों में) |
| उम्र की सीमा | मुख्यतः बचपन तक | बचपन से वयस्कता तक |
| अध्ययन पद्धति | बच्चों के साथ खेल व कहानियाँ | नैतिक दुविधाएं (Moral Dilemmas) |
| ध्यान केंद्र | संज्ञानात्मक विकास + नैतिकता | केवल नैतिक तर्क (Moral Reasoning) |
| विस्तार | कम विस्तृत | अधिक विस्तृत |
| पुरस्कार-दंड | प्रारंभिक अवस्था में | केवल अवस्था 1 में |
कोह्लबर्ग ने पियाजे की नैतिक विकास की अवधारणा को विस्तृत और व्यापक बनाया। पियाजे की 2 अवस्थाओं को कोह्लबर्ग ने 6 अवस्थाओं में विकसित किया।
1. लिंग पक्षपात (Gender Bias) — Carol Gilligan
कैरोल गिलिगन (Carol Gilligan) ने आलोचना की कि कोह्लबर्ग का अध्ययन केवल पुरुषों (लड़कों) पर आधारित था। महिलाएं देखभाल नैतिकता (Ethics of Care) पर ध्यान देती हैं, जबकि कोह्लबर्ग न्याय नैतिकता (Ethics of Justice) पर।
2. सांस्कृतिक पक्षपात (Cultural Bias)
पश्चिमी देशों की नैतिकता पूर्वी देशों से भिन्न हो सकती है। सामूहिकतावादी समाज (जैसे भारत) और व्यक्तिवादी समाज (जैसे USA) की नैतिकता अलग होती है।
3. नैतिक तर्क ≠ नैतिक व्यवहार
कोह्लबर्ग का सिद्धांत यह नहीं बताता कि कोई व्यक्ति उच्च नैतिक तर्क के बावजूद उसी प्रकार व्यवहार करेगा।
4. अवस्था 6 की अस्पष्टता
कोह्लबर्ग ने स्वयं बाद में अवस्था 6 को अपने सिद्धांत से हटा लिया क्योंकि अनुभवजन्य रूप से (Empirically) इसे सिद्ध करना कठिन था।
5. केवल तर्क, भावनाओं को नजरअंदाज
नैतिकता में भावनाएं (Emotions) और अंतर्ज्ञान (Intuition) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिन्हें कोह्लबर्ग ने नजरअंदाज किया।
कोह्लबर्ग की आलोचना करने वाली सबसे प्रमुख विद्वान → Carol Gilligan — उन्होंने "In a Different Voice" (1982) पुस्तक में इसकी आलोचना की।
कोह्लबर्ग के सिद्धांत के कक्षा में उपयोग के लिए निम्न बातें महत्वपूर्ण हैं:
शिक्षक कक्षा में नैतिक दुविधाएं प्रस्तुत करके बच्चों के नैतिक तर्क को विकसित कर सकते हैं।
बच्चे के उत्तर से नहीं, बल्कि उसके तर्क से मूल्यांकन करें — "तुमने ऐसा क्यों सोचा?"
समूह में नैतिक प्रश्नों पर चर्चा से बच्चे उच्च अवस्थाओं की ओर बढ़ते हैं।
कक्षा में लोकतांत्रिक वातावरण (Democratic Environment) बनाएं जहाँ बच्चे निर्णय लेने में भाग लें।
शिक्षक स्वयं उच्च नैतिक मानकों का पालन करे — बच्चे उसे role model के रूप में देखते हैं।
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